शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

देखो कौन कह रहा है आज कि, किसी ' ऊपर वाले ' ने नहीं बनाई यह दुनिया...यह तो खुद ही बनती और खत्म होती रहती है !!!


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मेरे 'आध्यात्मिक-धार्मिक' मित्रों,

लंबी चौड़ी प्रस्तावना में काहे को टाइम खोटी किया जाये...

सीधे मतलब की बात पर आते हैं...

जब जब बात होती है 'ऊपर वाले' की... तो यह कहा जाता है कि पृथ्वी है, सूर्य है, जीवन है और मानवों जैसी बुद्धिमान नस्ल है...दिन होते हैं, रात होती हैं, मौसम बीतते हैं,साल गुजरते हैं... और यह सब सबूत है इस बात का कि दुनिया को बनाने-चलाने वाला कोई है जरूर...


आज आप पढ़िये स्टीफन हॉकिंग के विचार क्या हैं इस बारे में...


प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कहा है कि ईश्वर ने यह यूनिवर्स नहीं रचा है बल्कि यह फ़िज़िक्स के नियमों का नतीजा है।


हॉकिंग ने अपनी नई किताब 'ग्रैंड डिजाइन' में कहा है कि गुरुत्वाकर्षण जैसे कई नियम हैं। ब्रह्मांड कुछ नहीं से खुद को बना सकता है और बनाएगा। स्वत: स्फूर्त सृजन की वजह से ब्रह्मांड है और हम हैं।

हॉकिंग ने 1968 में आई अपनी किताब 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' में कहा ब्रह्मांड के बनने में ईश्वर की भूमिका से इंकार नहीं किया था।

'डेली टेलीग्राफ' की एक रिपोर्ट के मुताबिक हॉकिंग ने कहा कि टचपेपर को रोशन करने और ब्रह्मांड के आगाज़ के लिए ईश्वर का आह्वान करना जरूरी नहीं है।


हिन्दी में यह खबर आप यहाँ पर... पढ़ सकते हैं।

आगे वे कहते हैं कि

In his latest book, he said the 1992 discovery of a planet orbiting another star other than the Sun helped deconstruct the view of the father of physics Isaac Newton that the universe could not have arisen out of chaos but was created by God.

"That makes the coincidences of our planetary conditions -- the single Sun, the lucky combination of Earth-Sun distance and solar mass, far less remarkable, and far less compelling evidence that the Earth was carefully designed just to please us human beings," he writes.


यानी १९९२ में एक गृह की खोज जो सूर्य की तरह के ही एक तारे के चक्कर लगा रहा है, सर आइजक न्यूटन के इस विचार कि 'बृह्मान्ड Chaos (अव्यवस्था) से स्वत: नहीं बन सकता, इसे ईश्वर ने बनाया' को गलत साबित करता है।

वह यह भी कहते हैं कि हमारे सौर मंडल की अनुरूपता--अकेला सूर्य, सूर्य के द्रव्यमान तथा पृथ्वी से सूर्य की दूरी का भाग्यशाली संयोग...अब उतना अनूठा-विलक्षण-असाधारण नहीं माना जाना चाहिये...तथा अब यह इस बात का अकाट्य सबूत नहीं रहा कि पृथ्वी को विचार पूर्वक आकार दिया गया...मनुष्य की जाति को प्रसन्न (और ईश भक्ति मे मग्न ???) रखने के लिये...


लिंक तो अनेकों हैं पर अंग्रेजी में इस पूरी खबर को आप यहाँ पर पढ़ सकते हैं...

Guardian, UK...

Economic Times, India...

Times Of India, India.




आभार!





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75 टिप्‍पणियां:

  1. दुनिया साइंस के नियमो से बन गयी, इंसान कोशिकाओ से बन गये तो फिर जिन्नो को किसने पैदा किया ? और वो कैसे बने ?

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    @ Anonymous ji,

    जिन्न तो ठीक वैसे ही बने जैसे ब्लॉगजगत में Anonymous बनते हैं।
    कौन यकीन करता है आज भूत-प्रेत-पिशाच-जिन्न आदि में ?

    आभार!


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  3. सब का अपना अपना ख्याल है जी.............

    ये दुनिया रंग - बिरंगी

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  4. आप यकीन नहीं करते होंगे, मै तो करता हूँ और करना ही पड़ता है क्योकि मेरे साथ तो कई सालो से जिन्न पीछे लगे हुए है !

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  5. मेरे घर में जादूगर है उसने जिन्न पाल रखा है !

    बहुत ही शरारती होते है ये !

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  6. see video 1

    http://www.youtube.com/watch?v=L8bY7bd6SsY

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  7. see video 2

    http://www.youtube.com/watch?v=HsJr-LttGTs&feature=related

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  8. प्रूफ के तौर पर ब्लॉग पर इन्टरनेट पर विडियो या उसके लिंक ही दे सकता था हकीकत जननी है तो इन्टरनेट के बहार भी थोड़ा घुमो फिरो,

    अगर किसी जिन्न के चपेट में आ गए तो फिर यहाँ ब्लॉग पर उसका इलाज भी पूछते फिरोगे !

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  9. ये शैतान कितने भी शरारती हो इनका गुरु इबलीस और उसके चेले शैतान जब कुरआन पड़ा जाता है तो अल्लाह का कलाम सुनकर ही भाग खड़े होते है ! तो ये उस ताकत का सामना करने कि हिम्मत कहाँ से जुटा सकते है ?

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  10. जिन्न और इबलीस की मां का साकनाका .....

    और तुझ जैसे बेनामी को क्या कहूँ साले ?????

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  11. Yaar Praveen, I am afraid your blog will become 'Killer Jhapata'!:)

    I don't have any problem with the hypothesis of Mr. Hawking but I have a question... 'Where does matter (particles) come from?'

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  12. गौरतलब है कि स्टीफन हॉकिंग ने 1988 में छपी अपनी बहुचर्चित किताब 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' में कहा था कि ईश्वर का अस्तित्व अनिवार्य तौर पर विज्ञान का विरोधी नहीं है। दुनिया के बनने में ईश्वर की भूमिका को परोक्ष रूप से स्वीकार करते हुए उन्होंने उस पुस्तक में कहा था, 'अगर हम संपूर्ण थियरी खोज सकें तो वह मानवीय तर्क की सबसे बड़ी जीत होगी। तभी हम ईश्वर का दिमाग समझ पाएंगे।

    मगर, अपनी नई किताब 'द ग्रैंड डिजाइन' में उन्होंने ईश्वर की किसी भी भूमिका की संभावना खारिज करते हुए कहा कि ब्रह्मांड का निर्माण शून्य से भी हो सकता है।

    http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6480649.cms

    "मुझे तीसरी किताब का इन्तजार है"
    "और चौथी का भी ".......

    अभी बुक आयी है , एक तरफा विचार का ही समर्थन नहीं कर सकते
    पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त

    read this too .....

    People who disagree with Hawking say science, being limited by laws of nature such as gravity, is an inadequate approach to understanding the role of God in the universe

    Professor George Ellis, president of the International Society for Science and Religion, told Fox News that Hawking offers a false choice between science or religion in which science may be the loser. “A lot of people will say, OK, I choose religion then,” he said, “and it is science that will lose out.”


    http://personalmoneystore.com/moneyblog/2010/09/02/stephen-hawking-god/
    http://www.guardian.co.uk/science/2010/sep/02/stephen-hawking-big-bang-creator

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  13. आईनस्टीन ने यह भी कहा था की इश्वर पांसे नहीं खेलता -हाकिंग की ये पुस्तक, इंटेलिजेंट डिजाईन के जवाब में है- ग्रैंड डिजाईन .!
    ईश्वर नहीं है इसमें अब क्या भ्रम किन्तु उसे होना नहीं चाहिए था क्या ?
    ईश्वर के होने की अनुभूति मात्र से जो आश्वस्ति ,जो निश्चिंतता जो जीवनीय ऊर्जा करोड़ों लोगों को मिलती है वह और किस विश्वास से मिलेगी प्रवीण जी ?
    काहें पूरी दुनिया को एक संतप्त ,बेचैन ,बेसहरा विश्वास की और ले जाने को कटिबद्ध है मित्र ?
    उन्हें उनकी अच्छी बुरी हालत पर छोड़ दो -यह जीवन वैसे भी दुखमय है -
    हाँ ईश्वर के नाम पर पाखंडियों के विरुद्ध हल्ला बोलो -ईश्वर के नाम पर कत्लेआम को रोको -और यह सब कर सको तो ठीक नहीं तो आस्था की बैसाखियाँ मत छीनो उनसे जिनके पास इसके अलावा कुछ ख़ास नहीं है !

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  14. जो वैज्ञानिक अपने ही वक्तव्य बार बार बदल रहा है उसकी बात का क्या भरोसा? वैसे मैं तो उसे वैज्ञानिक ही नहीं मानता.

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  15. Science without religion is lame, religion without science is blind.
    Albert Einstein, "Science, Philosophy and Religion: a Symposium", 1941
    US (German-born) physicist (1879 - 1955)

    http://www.quotationspage.com/quote/24949.html

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  16. "यानी १९९२ में एक गृह(ग्रह) की खोज जो सूर्य की तरह के ही एक तारे के चक्कर लगा रहा है, सर आइजक न्यूटन के इस विचार कि 'बृह्मान्ड Chaos (अव्यवस्था) से स्वत: नहीं बन सकता, इसे ईश्वर ने बनाया' को गलत साबित करता है।"
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    प्रवीण जी, मैं ये समझ नहीं पा रहा हूँ कि उपरोक्त पंक्तियों में ऎसा क्या लिखा है जिससे सिद्ध होता हो कि इस सृ्ष्टि का निर्माण करने वाली ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है. क्या किसी ऎसे ग्रह की खोज जो कि सूर्य की भांती ही किसी तारे के चक्कर लगा रहा है...से ये सिद्ध हो जाता है कि इस सृ्ष्टि को बनाने वाला कोई नहीं है. क्या बकवास है!

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  17. मैं भी सहमत हूँ पं.डी.के.शर्मा"वत्स" जी से

    @प्रवीण जी
    कहीं आप सिर्फ श्रद्धालुओं में तो शामिल नहीं हो गए ?? :))

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  18. Praveen Shah Times India ki ye news bhi pad lo

    http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6481876.cms

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  19. Beautifully said by Arvind Ji. It exppresses my own feelings in much better words than I could arrange for.

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  20. यह सब इस बात पर निर्भर करता है की आप ईश्वर को किस रूप में देखते हैं । स्टीफन हॉकिंग खुद अपने आप में एक मिसाल हैं की आत्म शक्ति से कैसे एक इंसान इस दुरूह परिस्थिति में भी जी सकता है । यही शक्ति भगवान है ।

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    @ Anonymous no. 1,(जिन्न वाले),

    आप यदि वाकई जिन्नों से परेशान हैं तो पहले किसी अच्छे फिजिशियन व उसके बाद यदि वे सलाह दें तो किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखायें...

    लेकिन आपका अंतिम कमेंट आपके आराध्य व आपकी किताब का गुणगान करता दिख रहा है...यदि ऐसा है तो आप गलत जगह आ गये हैं।

    आपके दिये दोनों विडियो लिंक देखे...केवल वही आदमी इसे सच मानेगा जिसका ऊपर का माला खाली हो...फेक हैं यह...एक्टर काम कर रहे हैं।


    @ Anonymous no. 2,(साकानाका वाले)

    इतना उत्तेजित न हों मित्र, मैं हूँ न यहाँ पर ।



    @ Anonymous no. 3,

    आपने जो लिंक दिया है उसमें खबर है कि...

    "चोरी से परेशान होकर बालाजी के ५२००० करोड़ के जेवरों का बीमा कराने का फैसला किया गया है।"

    अब इस पर क्या कहूँ?


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  22. आलेख से एक चिंता और जागी है कि अब हम लोग फिजिक्स को पढना छोड पूजने ही ना लग जायें :)

    उत्तर देंहटाएं
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    @ आदरणीय अलबेला खत्री जी,

    सहमत हूँ आपसे, आभार !


    @ मित्र निशांत,

    आज जो जानकारी हमारे पास है उसके आधार पर...

    Our universe is thought to have begun as an infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity.... मतलब अनंत रूप से गर्म, अथाह घना, अनंत उर्जा युक्त व अनंत रूप से सूक्ष्म एक बिन्दुमात्र था यह बृह्मान्ड कभी... उस समय न समय(space) था, न द्रव्य(mass) और न जगह (space)... फिर एक धमाका BIG BANG हुआ... समय, द्रव्य और जगह बने... बृह्मांड (Universe) बना जो आज भी फैल रहा(Expanding universe) है । फैलते फैलते एक समय ऐसा आयेगा जब यह प्रक्रिया रूक जायेगी...फिर सिकुड़ना जारी होगा...फिर वही infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity बन जायेगी...

    यानी पेंडुलम के एक छोर पर है infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity व दूसरे छोर पर विराट-अथाह बृह्मांड ।


    @ मित्र गौरव अग्रवाल,

    पिक्चर अभी वाकई बाकी है मेरे दोस्त...मैंने रिव्यू थोड़े ही लिखा है...बस बता रहा हूँ कि एक किरदार 'ऊपर वाला' जिसे इस पिक्चर में होना बताते हैं...शायद स्क्रीन टैस्ट में ही बाहर हो गया है।

    और हाँ मेरी अगाध श्रद्धा है मानव जाति की सामूहिक समझ व तार्किकता पर...


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    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    मुझे इतना ओवरएस्टीमेट न करिये देव, मेरे कहे मात्र से कोई मानना पूजना छोड़ने वाला नहीं...मैं तो महज चिंतन हेतु एक कम उपयुक्त रास्ते की ओर इशारा भर कर रहा हूँ... वैसे यह क्या बेहतर नहीं रहेगा कि हम पाखंड, कत्लेआम व अंधविश्वास के मूल, उनके प्राणों पर प्रहार करें।

    @ मित्र जीशान जैदी,

    आपके मानने या न मानने से क्या होता है...स्टीफन हॉकिंग आज के दौर के सर्वश्रेष्ठ Theoretical Physicist माने जाते हैं...वैसे आप किसे एकमात्र व सबसे महान वैज्ञानिक मानते हो, सभी को पता ही है ... ;))


    @ पं.डी.के.शर्मा"वत्स" जी,

    आपके प्रश्न का उत्तर उसी के नीचे लिखे दूसरे पैराग्राफ में है जो इस प्रकार है:-

    "वह यह भी कहते हैं कि हमारे सौर मंडल की अनुरूपता--अकेला सूर्य, सूर्य के द्रव्यमान तथा पृथ्वी से सूर्य की दूरी का भाग्यशाली संयोग...अब उतना अनूठा-विलक्षण-असाधारण नहीं माना जाना चाहिये...तथा अब यह इस बात का अकाट्य सबूत नहीं रहा कि पृथ्वी को विचार पूर्वक आकार दिया गया...मनुष्य की जाति को प्रसन्न (और ईश भक्ति मे मग्न ???) रखने के लिये..."

    यानी थ्योरी आफ इंटैलिजेन्ट क्रियेशन अब गौण हो गई है...जब यह संभावनायें प्रबल हो गई हैं कि बृह्मांड में अन्यत्र भी जीवन योग्य परिस्थितियाँ युक्त ग्रह व जीवन हो सकता है।


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    उत्तर देंहटाएं
  25. Praveen, you have written: उस समय न समय(space) था, न द्रव्य(mass) और न जगह (space)... फिर एक धमाका BIG BANG हुआ... समय, द्रव्य और जगह बने... बृह्मांड (Universe) बना

    In my knowledge, nothing can come out of a void, nothing can come out of nowhere. This is very baffling. I think that mass or energy or matter can be created but how can one create time and space? Why should they not exist before big bang? This is my contention.

    उत्तर देंहटाएं
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    @ मित्र प्रेत विनाशक,

    आभार! उत्तर मैं पहले दे चुका हूँ।



    @ आदरणीय डॉ० महेश सिन्हा जी,

    आभार आपका !



    @ अली सैय्यद साहब,

    आपकी चिन्ता जायज है...वैसे भी क्या यह सच नहीं है कि भिन्न-भिन्न समयों में अलग-अलग चीजें पूजी गई हैं/जायेंगी ?

    आभार!


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    मित्र निशांत,

    "an infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity...."
    पर ध्यान दें, यहाँ कुछ नहीं है...बस एक शून्य...समय, द्रव्य और स्पेस बिगबैंग के बाद बने...

    समझना मुश्किल तो है...पर यदि प्रयत्न किया जाये तो समझा जा सकता है।

    "This is very baffling. I think that mass or energy or matter can be created but how can one create time and space?"

    जवाब थ्योरिटिकल फिजिक्स में हैं।


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  28. @ प्रवीण जी
    स्क्रीन टेस्ट ?? ..... हा हा हा

    मित्र,

    पहले स्टोरी तो फाइनल हो जाये
    यहाँ तो राइटर्स के विचार ही नहीं मिल पा रहे [अपने आप से भी :))]

    आप भी "शायद" का प्रयोग करते हैं :)

    चलिए ..... जो भी हो.... देखते हैं.... आगे क्या नतीजे निकलतें हैं
    फिलहाल इस अपडेट के लिए आपका ह्रदय से धन्यवाद

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  29. भगवान ने बनाई या भौतिकी ने क्या फ़र्क पडता है .

    उत्तर देंहटाएं
  30. आपकी खूबसूरत पोस्ट को ४-९-१० के चर्चा मंच पर सहेजा है.. आके देखेंगे क्या?

    उत्तर देंहटाएं
  31. हॉकिंग जी की विद्वता को प्रणाम। जब प्रश्नों के सिरे ढूढ़ने की बात आती है तो विज्ञान बात बदल अपने योगदान बखानने लगती है। अध्यात्म ने तो कभी प्रश्न नहीं पूछा कि इलेक्ट्रान जब देखा नहीं तो इलेक्ट्रॉनिक्स कैसे मान लें। प्रभाव को देख जब इलेक्ट्रॉन का अस्तित्व मान बैठे हैं तो कई ऐसे प्रभाव जिनके उत्तर नहीं ज्ञात, उन्हें स्वचालित कैसे माना जा सकता है।
    जहाँ एक ओर कर्मकाण्ड स्वीकार नहीं वहीं दूसरी ओर विज्ञान के सर्वज्ञाता होने के दावे से भी परहेज है।

    उत्तर देंहटाएं
  32. प्रवीण भाई
    काफ़ी कुछ कहा जा चुका है… चर्चा मजेदार चल रही है… चुपचाप देख रहा हूं…

    आपके सारे जवाबों में से दो जवाब बेहद पसन्द आये, पहला जो बेनामी को दिया है वीडियो देखकर… और दूसरा जो जीशान जैदी को दिया है, बिना कुछ देखे भी… :) :) :)

    उत्तर देंहटाएं
  33. हॉकिन्स कि शारीरिक क्षमता और मानसिक क्षमता दोनों अलग अलग हैं । कहीं पढ़ा था जो श्री से अक्षम हो जताते हैं { अब ज्यादा तर ऐसी बात लिखने के साथ ये भी लिखा जाता हैं भगवान् ना करे } वो बहुत अधिक intelligent होते हैं . एक क्षमता कम होती हैं तो दूसरी बहुत बढी हुई होती हैं । लेकिन ऐसा क्यूँ होता हैं जो भगवान् को मानते हैं वो कहते हैं ईश्वर कहीं ना कहीं बराबर करता हैं । हॉकिन्स को क्यूँ दुनिया के शुरू होने का सत्य खोजना हैं ?? साइकोलॉजी भी विज्ञान ही हैं शायद इंसानी दिमाग कि फितरत को समझाती हैं । क्या रहा हो हॉकिन्स के मन मे जब वो बच्चा था और आम बच्चो कि तरह नहीं था । क्या उसके घर मे पूजा पार्थना होती ही नहीं थी या उनसे विरक्त हो कर उस कि रूचि ईश्वर { दुनिया के जनक } को उसका ड्यू ना देना क्युकी हॉकिन्स को उसका ड्यू नहीं मिला ।
    first deserve then desire और इस सिधांत पर हॉकिन्स ने prove कर दिया ईश्वर deserve ही नहीं करता कि हम उसको दुनिया का जनक माने । आप मेरी बात का क्या जवाब देगे जिज्ञासा हैं

    उत्तर देंहटाएं
  34. प्रवीण शाह जी,
    आपने हाकिंस की किताब, जो अभी अभी पब्लिश हुई है के आधार पर बताया की,
    "....फैलते फैलते एक समय ऐसा आयेगा जब यह प्रक्रिया रूक जायेगी...फिर सिकुड़ना जारी होगा...फिर वही infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity बन जायेगी...
    यानी पेंडुलम के एक छोर पर है infinitesimally small, infinitely hot, infinitely dense, something - a singularity व दूसरे छोर पर विराट-अथाह बृह्मांड ।"
    यह बात मैं दिनांक 20 अप्रैल 2009 को साइंस ब्लोग्गर्स पर लिखी पोस्ट पर इन शब्दों में बता चुका हूँ "ब्रह्माण्ड हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता. एक समयांतराल में यह फैलता है और दूसरे समयांतराल में यह सिकुड़ता है."
    यह कथन आज से बारह सौ साल पहले के इस्लामी विद्वान इमाम जाफर अल सादिक (अ.स.) का है. अब आप बताएं मैं किसको महान मानूं?
    और हाँ इमाम जाफर अल सादिक पूरी तरह आस्तिक थे.

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  35. @प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कहा है कि ईश्वर ने यह यूनिवर्स नहीं रचा है बल्कि यह फ़िज़िक्स के नियमों का नतीजा है।

    सबसे पहले आप यह बताइये की नियम क्या हैं ? और उनको कौन बनाता है ? यदि कहो की अपने आप नियम बनते हैं तो यह बात अपने आप से ही विरोध करती है.
    क्योंकि नियम ज्ञान का ही एक स्वरुप है. बिना ज्ञान के नियम नहीं होता. जैसे देश का सविंधान या नियम राजा या सरकार बनाती है, वैज्ञानिक, प्रयोग के आधार पर ज्ञान पूर्वक नियम बताते हैं तो ब्रह्माण्डीय नियम

    में आप चेतन या ज्ञान की अपेक्षा क्यों नहीं रखते हैं जिसके कण-२ से विज्ञान झलकता है.नियम ज्ञान से होता है अपनी अन्तरआत्मा की गहराई में उतर कर सोचिये.

    @हॉकिंग ने अपनी नई किताब 'ग्रैंड डिजाइन' में कहा है कि गुरुत्वाकर्षण जैसे कई नियम हैं। ब्रह्मांड कुछ नहीं से खुद को बना सकता है और बनाएगा। स्वत: स्फूर्त सृजन की वजह से ब्रह्मांड है और हम हैं।

    गुरुत्वाकर्षण बल वस्तुओं में क्यों है इस बात का कोई आधुनिक वैज्ञानिक उत्तर दे सकता है क्या. नहीं क्योंकि जिसका उत्तर नहीं पता होता उसको स्वतः बोल दिया जाता है जबकि इस संसार में एक भी उदाहरण ऐसा

    दीजिए जो ज्ञान-पूर्वक न हो प्रत्येक चीज़ के पीछे कुछ-न-कुछ कारण अवश्य रहता है बिना कारण के इस जगत में कुछ नहीं है. इस जगत में प्रत्येक तत्व के ३ कारण अवश्य होते हैं - पहला उपादान, दूसरा

    नीमित्त और तीसरा साधारण-सहायक कारण . उपादान उसे कहते हैं जिससे कुछ बनता है जैसे घड़े का उपादान कारण मिटटी है. घड़े का नीमित्त कारण अर्थात उसको बनाने वाला कुम्हार अर्थात चेतन तत्व है और

    तीसरा चाक, दण्ड आदि साधारण सहायक गौण कारण हैं.कोई भी तत्व इन ३ कारण के बिना नहीं देखा जाता. इसी प्रकार जगत का उपादान कारण प्रकृति जिसको आप अपनी भाषा में 'कुछ नहीं'(Nothing)

    कहते हैं वह प्रकृति अपने आप में तीन तत्वों से मिल कर बनी है. सत्व , रजस् और तमस् ये ३ प्रकार के मूल तत्व हैं इनकी साम्यवस्था का नाम प्रकृति है अर्थात जब ये तत्व कार्यरूप में परिणित नहीं होते, प्रत्युत

    मूल कारण रूप में अवस्थित रहते हैं तब इनका नाम प्रकृति है। समस्त कार्य की कारणरूप अवस्था का नाम प्रकृति है। इस प्रकार कार्यमात्र का मूल उपादान होने से गौण रूप में भले इसे एक कहा जाये ,पर प्रकृति नाम

    का एक व्यक्ति रूप में कोई तत्व नहीं है। कार्यमात्र के उपादान कारण की मूल भूत स्तिथि 'प्रकृति'है। समस्त वैषम्य अथवा द्वन्द्व विकृति अवस्था में संभव हो सकते है, इसलिए प्रकृति स्वरूप को साम्य अवस्था कहकर

    स्पष्ट किया जाता है। इस प्रकार मूल तत्व ३ वर्ग में विभक्त है और वह संख्या में अनंत है । तो यह प्रकृति 'कुछ नहीं' नहीं है जितने समय यह जगत प्रकट अवस्थामें उपस्थित रहता है उतने समय अप्रकट अवस्था में

    अपने मूल कारण प्रकृति में लीन रहता है लेकिन ऐसा कभी नहीं है की होता ही नहीं. क्योंकि अभाव से किसी की उत्पत्ति नहीं होती जैसे कोई यह कहे बिल में सांप नहीं है फिर भी निकल आया या कमरे में कोई भी नहीं

    है फिर भी वो सब उसमें से निकल कर बहार आये ऐसा सम्भव नहीं है. इसीलिए बिना उपादान के भी कोई तत्व सम्भव नहीं है.


    अब जब प्रकृति अपनी साम्य अवस्था में है और वो अचेतन है मतलब उसमें ज्ञान नहीं है तो जगत में परिणित होने के लिये उसमें कोई कारण नहीं है तो वह स्वतः इस जगत में परिवर्तित कैसे हो सकती है क्योंकि बिना

    ज्ञान के किसी जड़ तत्व में चेष्टा नहीं होती है और कार्योन्मुख होने के लिये उसे सदा चेतन की अपेक्षा रहती है यह तुम इस जगत में प्रत्यक्ष देख सकते हो. तो प्रकृति में जब चेतन की प्रेरणा से उसमें क्षोभ होता है तब

    वे मूल तत्व कार्योन्मुख हो जाते हैं । अर्थात कार्यरूप में परिणित होने के लिए तत्पर हो जाते हैं। तब उनकी अवस्था साम्य न रह कर वैषम्य की और अग्रसर होती है और वो ३ तत्व ही आपस में मिथुनीभूत होके जगत

    में परिणित हो जाते हैं.

    @वह यह भी कहते हैं कि हमारे सौर मंडल की अनुरूपता--अकेला सूर्य, सूर्य के द्रव्यमान तथा पृथ्वी से सूर्य की दूरी का भाग्यशाली संयोग...अब उतना अनूठा-विलक्षण-असाधारण नहीं माना जाना चाहिये...तथा

    अब यह इस बात का अकाट्य सबूत नहीं रहा कि पृथ्वी को विचार पूर्वक आकार दिया गया...मनुष्य की जाति को प्रसन्न (और ईश भक्ति मे मग्न ???) रखने के लिये...

    यह भाग्यशाली सयोंग से आपका क्या आशय है- और उपरोक्त बात को थोड़ा स्पष्ट कीजिए कि आप इस बारे में कहना क्या चाहते हैं?

    उत्तर देंहटाएं
  36. सुनो जब यह कार्य सृष्टि उत्पन्न नहीं हुई थी, तब एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर और दूसरा जगत का कारण अर्थात जगत बनाने की सामग्री विराजमान थी. उस समय असत् शून्य नाम आकाश अर्थात जो नेत्रों से देखने में

    नहीं आता है सो भी नहीं था क्योंकि उस समय उसका व्यवहार नहीं था. उस काल में सत् अर्थात सतोगुण रजोगुण और तमोगुण मिला के जो प्रधान कहाता है वो भी नहीं था . उस समय परमाणु भी नहीं थे तथा

    विराट अर्थात जो सब स्थूल जगत के निवास का स्थान है सो भी नहीं था . जो यह वर्तमान जगत है, वह भी अनन्त शुद्ध ब्रह्मा को नहीं ढांक सकता है, और उससे अधिक वा अथाह भी नहीं हो सकता जैसे कोहरा

    का जल पृथ्वी को नहीं ढाक सकता है , उस जल से नदी में प्रवाह भी नहीं चल सकता और न कभी वो गहरा वा उथला हो सकता है-- इससे जाना जाता है कि परमेश्वर अनन्त है और जो यह उसका बनाया जगत

    है, सो ईश्वर की अपेक्षा से कुछ भी नहीं है.

    जब जगत नहीं था, तब मृत्यु भी नहीं था, क्योंकि सब स्थूल जगत सयोंग से उत्पन्न होके वर्तमान हो, पुनः उसका और शरीर आदि का वियोग हो तब मृत्यु कहावे सो शरीर आदि पदार्थ उत्पन्न नही नहीं हुए थे.

    जो आकाश के समान व्यापक है, उसी ईश्वर में सब जगत निवास करता है और जब प्रलय होता है, तब भी सब जगत कारण रूप होके ईश्वर के सामर्थ्य में रहता है और फिर भी उसी से उत्पन्न होता है. यह सृष्टि

    चक्र है.

    अपरिणामी तत्व चेतन और परिणामी तत्व जड़ का भेद यदि समझ लिया जाये तो ईश्वर है कि नहीं उसका उत्तर आप को मिल जायेगा.

    स्वतः इस जगत में कुछ नहीं होता , प्रत्येक वस्तु के पीछे कारण होता है और इस जगत का कारण उपादान के रूप में प्रकृति और नीमित्तकार के रूप में ईश्वर है. मनुष्य सहित सभी जीव अल्पज्ञ हैं इस जगत को

    बनाने में अक्षम है.ईश्वर कोई वस्तु, शरीर या कोई व्यक्ति नहीं है --जिस प्रकार सभी आकाश के अन्दर और आकाश सभी के अन्दर विराजमान है एक परमाणु भी उससे रिक्त नहीं है उसी प्रकार ईश्वर के अन्दर उस

    आकाश सहित सभी और ईश्वर उन सब के अन्दर उपस्थित ऐसा तत्व है जिसमें दिशा, काल आदि का भी कोई अस्तित्व नहीं होता वो अपने आप में पूर्ण शुद्ध स्वतन्त्र अनन्त है यह सम्पूर्ण जगत भी उसकी अनन्तता के

    आगे तुच्छ है उससे आगे कुछ नहीं है. जिस प्रकार आत्मा इस भौतिक शरीर का अधिष्ठाता है उसी प्रकार इस सम्पूर्ण जगत और आत्मा का भी आत्मा वह ईश्वर है उसको और भी तर्क से सिद्ध किया जा सकता है.

    अभी टिप्पणी काफी लम्बी हो गयी है - शेष फिर कभी

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  37. @zeashan zaidi

    इमाम जाफर अल सादिक (अ.स.) ने अपने वक्तव्य के समर्थन में हाकिंग की तरह गणितीय साक्ष्य और सूत्र तो ज़रूर दिए होंगे. क्या आप उन समीकरणों को साइंस ब्लॉगर पर प्रस्तुत कर सकते हैं?

    (अब यह न कहना की इमाम जाफर अल सादिक (अ.स.) का कथन ही प्रमाण है, हमें और किसी गणितीय साक्ष्य की ज़रूरत नहीं है, जिन्हें ज़रूरत है वे जहन्नुम जायेंगे)इमाम जाफर अल सादिक (अ.स.)

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  38. sari samasyayen tark se hal nahi hoti....
    iswarah nasti kahne wala bhi pahle iswar hi kahta hai baad mein agyanta vash nasti jud jata hai.... isn't it?
    informative write-up!!!

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    @ आदरणीय धीरू सिंह जी,

    वाकई फर्क पड़ना भी नहीं चाहिये।


    @ आदरणीय प्रवीण पान्डेय जी,

    आपका कमेंट थोड़ा निर्मम सा लगता है...इलेक्ट्रान को कभी भी देखा नहीं जा सकेगा...Magnification की सीमायें हैं और मानव नेत्रों की भी...पर यह कहना कि इलेक्ट्रान को साबित ही नहीं किया जा सकता..गलत लगता है...बहुत सी चीजें हैं इर्द गिर्द...मोबाइल की या लैपटॉप की बैटरी की ही ओर देखिये...चार्ज होती हैं या नहीं ?

    फिर बात आती है सभी के लिये एक से अनुभव की...कोई मानव हो या पशु या रोबो ही, लाइट स्विच यदि ऑन करेगा तो लाइट सभी के लिये जलेगी...आध्यात्म के साथ ऐसा नहीं है...सबके अनुभव अलग-अलग हो जाते हैं...महज लंबे चौड़े शब्द ही होते हैं...और अर्थ भी अलग-अलग...

    वाकई विज्ञान को सभी चीजों का ज्ञान नहीं अब तक...और हो सकता है कि कुछ चीजों को कभी भी समझा ही न जा सके...आखिर मानव मस्तिष्क की भी कुछ सीमायें तो होंगी ही...पर वह सभी चीजों को समझने का ईमानदार प्रयत्न तो करता ही है...यही महत्वपूर्ण है ।

    @ आदरणीय सुरेश जी,

    धन्यवाद देव, पर आपका चुप रहना मुझे अच्छा नहीं लग रहा...:)


    ...

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    @ रचना जी,

    १- स्टीफन हॉकिंग का बचपन आम बच्चों की तरह ही सामान्य था, २१ वर्ष की उम्र में पहली बार पता चला कि वह Amyotrophic Lateral Sclerosis से ग्रस्त हैं।

    २- यह मानना गलत है कि जिन लोगों को यह लगता है कि ईश्वर ने उनको वह सब नहीं दिया जिसके वे लायक थे... वे ईश्वर को वह जगह नहीं देते जिसके ईश्वर लायक है...

    ३- पर मैं यह भी कहूँगा कि अधिकाँश ऐसे लोग जो उन जगहों पर आज बैठे हैं जिनके वे लायक नहीं हैं/थे/होंगे...उन्होंने ही ईश्वर को उस जगह बैठाया है जिस जगह के वह लायक न है/न था/ न होगा ।


    @ मित्र जीशान जैदी,

    हो सकता है कि ईमाम जफर अल सादिक (अ. स.)ने १२०० साल पहले ऐसा कहा हो...वह भी इस कथन को उस जमाने में कहने के लिये महान हैं मेरी नजर में...यदि आप यहीं पर उनके कथन को उसके संदर्भों सहित उद्धृत कर दें तो पाठकों को काफी लाभ होगा...रही बात आस्तिक होने या न होने की...तो हमारे धार्मिक विश्वासों का हमारी मानसिक/वैचारिक क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता...अत: उनकी आस्तिकता का उल्लेख यहाँ बेमानी है।


    @ मित्र असहज,

    शुक्रिया !


    @ अनुपमा जी,

    सारी समस्यायें तर्क से हल नहीं होती...सही है...उतना ही सही यह भी है कि...अंधश्रद्धा व अंध विश्वासों से काफी सारी गैरजरूरत समस्यायें उत्पन्न होती हैं ।

    आपके ईश्वर नस्ति वाले तर्क के जवाब में कोई यह भी कह सकता है कि... "हम को ईश्वर ने बनाया" कहने वाले ने शब्दों का क्रम गड़बड़ा दिया है... और सही क्रम होगा " हम ने ईश्वर को बनाया"


    ...

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    @ सौरभ आत्रेय जी,

    १- सबसे पहले तो मेरी स्वीकारोक्ति...आध्यात्म मेरा विषय कभी नहीं रहा...जब भी कोशिश की समझने कि तो मुझे वे बातें Pseudo Intellectual-Pseudo Scientific Mumbo-Jumbo से ज्यादा कुछ नहीं लगी अत: आपकी टिप्पणियों के अधिकाँश को समझ तक नहीं पाया...कर बद्ध क्षमाप्रार्थी हूँ और अपनी इस सीमा को सर झुका कर स्वीकार करता हूँ।


    २-@वह यह भी कहते हैं कि हमारे सौर मंडल की अनुरूपता--अकेला सूर्य, सूर्य के द्रव्यमान तथा पृथ्वी से सूर्य की दूरी का भाग्यशाली संयोग...अब उतना अनूठा-विलक्षण-असाधारण नहीं माना जाना चाहिये...तथा अब यह इस बात का अकाट्य सबूत नहीं रहा कि पृथ्वी को विचार पूर्वक आकार दिया गया...मनुष्य की जाति को प्रसन्न (और ईश भक्ति मे मग्न ???) रखने के लिये...

    यह भाग्यशाली सयोंग से आपका क्या आशय है- और उपरोक्त बात को थोड़ा स्पष्ट कीजिए कि आप इस बारे में कहना क्या चाहते हैं?


    थ्योरी आफ इंटैलिजेन्ट क्रियेशन के मुताबिक किसी शक्ति ने जानबूझ कर हमारे ग्रह में जीवन को धारण करने योग्य स्थितियाँ बनाई...मतलब यह सब पूर्व नियोजित था...

    अब जब इस बात के सबूत मिल गये हैं कि सूर्य समान बहुत से तारों के पृथ्वी समान ग्रह हो सकते हैं...और ऐसे तारों की संख्या अनंत भी हो सकती है...तो यह संभावना भी बलवती हो जाती है कि किसी न किसी रूप में जीवन बृह्मांड में कहीं और भी होगा... यानी हम अकेले ही भाग्यशाली नहीं हैं/रहेंगे...

    क्या उन सब जगहों पर भी ईश्वर को माना जाता होगा?


    ...

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  42. प्रवीण शाह जी- बिना अपने आप को जाने समझे ईश्वर को आप नहीं समझ सकते हैं और आपको अध्यात्म Pseudo Intellectual-Pseudo Scientific Mumbo-Jumbo लगता है पर उसका आप कारण तो बताइए. अध्यात्म भी सत्य विज्ञान है और इस विषय को यदि समझना चाहते हो तो अपने मन के पूर्वाग्रह को छोड़ कर अपनी गहराइयों में उतारकर चिन्तन करके बातों को परखें. जो बात मैंने यहाँ कहीं हैं वो ही कल को यदि पश्चिमी देशों का कोई Scientist उसको ultra science कहकर समझाने लगे तब आप उसको Pseudo-Intellectual या Scientific Mumbo-Jumbo नहीं बोलोगे. खैर आप जो भी समझो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है वैसे भी जब बात तर्क-वितर्क की हो तो यह कहना उचित नहीं होता कि मेरे को यह समझ में नहीं आता और मेरे को यह सब छद्म-विज्ञान लगता है. ये दोनों बात भी अपने आप में विरोधी हैं जो समझ नहीं आता आप उसके बारे में निर्णय नहीं रख सकते कि वो सत्य है कि असत्य. समझ आता है तभी आप उसको अपने तर्क से सत्य या असत्य घोषित करिये.
    जो बात स्पष्ट नहीं होती उसको समझे या पूंछे जैसे कि मैंने भी आपसे एक बात का स्पष्टीकरण माँगा. आप अपना तर्क रखें फिर मैं अपना रखता हूँ. एक स्वस्थ वाद करते हैं इस विषय पर बिना पूर्वाग्रस्त हुए.

    मेरे कहने का सार इतना था कि सृष्टि में नियम हैं यही बात तो ईश्वर को मानने के लिये सबसे बड़ी सहायक होती है कि नियम, बिना ज्ञान के नहीं होते हैं, इस बारे में आप अपना तर्क रखिये फिर मैं अपना रखता हूँ.

    और सूर्य,पृथ्वी आदि के समान इस ब्रह्माण्ड में असंख्य लोक हैं इस बात से भी ईश्वर की असिद्धि होने में क्या तर्क है यह स्पष्ट कराना चाहता था मैं.
    आपकी बात से ईश्वर की असिद्दी को नहीं सिद्धि को बल मिलता है.

    यह मात्र सम्भावना ही नहीं है कि जीवन ब्रह्माण्ड में कहीं और भी होगा बल्कि निश्चित है इस अनन्त ब्रह्माण्ड में अनन्त लोक या ग्रह, तारे इत्यादि हमारी पृथ्वी, सूर्य की भांति निष्प्रयोजन नहीं हो सकते उनमें बहुतों में जीवन अवश्य होगा, न होने का क्या तर्क है.यह ब्रह्माण्ड विज्ञानमय है इस बात को आज के सभी वैज्ञानिक भी मानते हैं किन्तु वो द्रष्टा और द्रश्य में भेद नहीं कर पाते इसीलिये उस चेतन तत्व को नकारते हैं. द्रष्टा(चेतन) , द्रश्य(जड़) नहीं हो सकता और द्रश्य, द्रष्टा नहीं हो सकता दोनों की पृथक सत्ता है यही समझना है. इस बात को समझे बिना कोई ईश्वर को नहीं समझ सकता है.

    मनुष्य, जीवन क्या है इसीको यदि मनुष्य समझले तो सारी बातों का उत्तर मिल जायेगा. आप अपना ध्यान सत्य को जानने के लिये स्वस्थ वाद में लगाएं और फालतू के लोगो से उलझने में नहीं. आप मेरे कहने का तात्पर्य समझ चुके होंगे और उसको कृपया अन्यथा न लें और अपना तर्क मेरे तर्क के आगे रखें.

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  45. मेरा उपरोक्त टिप्पणियों में फालतू लोगो से तात्पर्य केवल मुर्ख जेहादियों से था. कृपया सभी महानुभवों से मेरा अनुरोध है उसको अन्यथा न लें.

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  46. @Ab Inconvenienti Ji
    गणित सच्चाई तक पहुँचने का एक माध्यम है. लेकिन अगर कोई बिना किसी माध्यम के सच्चाई तक पहुँच जाए या ईश्वर उसे सच्चाई तक पहुंचा दे तो उसकी महानता इसलिए कम नहीं हो जायेगी की उसने गणितीय फार्मूले प्रदर्शित नहीं किये. आज से बारह सौ साल पहले अगर कोई आज के सिद्धांत की बात कर रहा है तो उसकी महानता के लिए यही काफी है.

    @Praveen Shah Ji,
    अन्य ग्रहों पर जीवन का सुबूत ईश्वर के न होने का सुबूत कैसे हो सकता है? ईश्वर यदि पृथ्वी पर जीवन पैदा कर सकता है तो अन्य ग्रहों पर क्यों नहीं? वैसे हमारे धर्मग्रन्थ भी हरगिज़ दूसरी दुनियाओं से इनकार नहीं करते हैं.

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  47. वैज्ञानिक यह तो कहता है की सब कुछ कुदरत के नियमों (Laws of Nature or Laws of Physics) से बना है, लेकिन यह कुदरत के नियम कैसे बने इस बारे में साइंस मौन रहती है. लेकिन हमारे धर्मग्रन्थ तो इसका भी जवाब दे रहे हैं.

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  48. @ जीशान जैदी

    बहुत सारे लोग बहुत सी बातें कहते हैं. अगर स्टीफन हाकिंग भी बिना गणित के दावा करे तो कोई नहीं मानेगा. इसी आधार पर न्यूटन तक की कई बातें अमान्य कर दी गई. भले ही हो वो बड़े भौतिकविद.

    फिर तुम्हारे इमाम की बात कैसे मान लें? वो बिना आधार के कहें की जिन्न, भूत, परी होते हैं तो वह भी मान लें, तुम्हारे नबी सहित कई इमाम इनका अस्तित्व मानते थे. तुम भी मानते हो? क्योंकि धर्मग्रंथों में लिखा है, इनके लिए भी गणित की दरकार नहीं.

    और हाँ, बेकार की इधर उधर की बातें छोड़ मान्य सन्दर्भ दो की इमाम ने "ब्रह्माण्ड हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता. एक समयांतराल में यह फैलता है और दूसरे समयांतराल में यह सिकुड़ता है" किस ग्रन्थ में कहा, और इसे साबित करने के लिए कौन से वैज्ञानिक साक्ष्य रखे?

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    @ सौरभ आत्रेय जी,

    "जो बात स्पष्ट नहीं होती उसको समझे या पूंछे जैसे कि मैंने भी आपसे एक बात का स्पष्टीकरण माँगा. आप अपना तर्क रखें फिर मैं अपना रखता हूँ. एक स्वस्थ वाद करते हैं इस विषय पर बिना पूर्वाग्रहग्रस्त हुए"

    बहुत सही बात कही है आपने...मेरे मन में तमाम सवाल हैं...पर आपसे मात्र १२ प्रश्न ही करूंगा...आशा है उत्तर मिलेगा...व इन सवालों पर एक स्वस्थ संवाद भी होगा...

    आज के लिये प्रश्न हैं:-

    १- ईश्वर क्या है, परिभाषित करें ?
    २- ईश्वर क्यों है ?
    ३- ईश्वर किसके लिये है ?

    आभार!


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    उत्तर देंहटाएं
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    मित्र जीशान जैदी,

    "मान्य सन्दर्भ दें कि इमाम ने "ब्रह्माण्ड हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता. एक समयांतराल में यह फैलता है और दूसरे समयांतराल में यह सिकुड़ता है" किस ग्रन्थ में कहा, और इसे साबित करने के लिए कौन से वैज्ञानिक साक्ष्य रखे?"

    मित्र असहज की इस बात में दम है...आपको सोचना चाहिये इस पर...यह तो अवश्य बताईये कि ईमाम जफर अल सादिक (अ. स.)ने १२०० साल पहले ऐसा कब,कहाँ और किस संदर्भ में कहा था...उन्होंने और क्या क्या कहा...आपने जिज्ञासा बढ़ा दी है।


    ...

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  51. @प्रवीण शाह जी,
    मैंने जिस किताब से इसका सन्दर्भ लिया है वह स्ट्रेसबोर्ग यूनिवर्सिटी के इस्लामिक रिसर्च सेंटर में 1940 -50 के बीच हुई रिसर्च की थीसिस है. इस रिसर्च में २५ विद्वानों, प्रोफेसर्स इत्यादि ने हिस्सा लिया था. इस थीसिस का ईरान में फ्रेंच से फ़ारसी में 'जाफर अल सादिक - मग्ज़े मुत्फक्किरे जहाने शिया' (यानी इस्लाम के शिया फिरके का दिमाग - जाफर अल सादिक) नाम से अनुवाद हुआ. अब इसका उर्दू और हिंदी में भी ट्रांसलेशन उपलब्ध है. यह इमाम की वैज्ञानिक पहुँच को बखूबी बताती है.
    हालांकि केवल यही एक किताब नहीं है जो इमाम के बारे में बताती है बल्कि ऐसी सैंकड़ों किताबें उपलब्ध हैं जो अरबी, फारसी और कुछ उर्दू में हैं. और इससे कई गुना किताबें बादशाहों की लड़ाइयों, और शिया सुन्नी फसादों में नष्ट हो चुकी हैं. और बहुत सी योरोप की छुपी हुई लाइब्रेरियों की शोभा बन चुकी हैं.
    नेट पर इमाम जाफर अल सादिक (अ.स.) के बारे में कम ही जानकारी उपलब्ध है, फिर भी यह लिंक आपके काम आ सकता है.
    फादर ऑफ़ केमिस्ट्री जाबिर इब्ने हय्यान (जिसे योरोप में गेबर नाम से जाना जाता है) इमाम जाफर अल सादिक (अ.स) का शिष्य था.

    @Ab Inconvenienti Ji
    अगर आप गणितीय फार्मूलों को ही साइंस का पैमाना मानते हैं तो साइंस की बहुत सी ब्रांचों को साइंस से अलग रख देना पड़ेगा. जिनमें मेडिसिन, एनीमल बिहैवियर, जूलोजी, बोटनी, केमिस्ट्री वगैरह शामिल हैं. फिजिक्स में भी बहुत से सिद्धांत पहले खोजे गए, उनका गणितीय ट्रीटमेंट बहुत बाद में हुआ. इसका यह मतलब नहीं की वह थ्योरी गलत हो गई. इमाम जाफर अल सादिक ने उस समय के लोगों की अक्ल और उनके ज्ञान के आधार पर साइंस की थ्योरीज पेश की थीं. उस समय डिफरेंशियल ज्योमेट्री यदि अस्तित्व में होती तो वह अपनी थ्योरी का गणितीय रूप अवश्य पेश करते.

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  52. @जीशान जैदी

    मेडिसिन, एनीमल बिहैवियर, जूलोजी, बोटनी वगैरह भी पूरी तरह भौतिक अवलोकन (ओब्सर्वेशन) पर आधारित हैं, सुव्यवस्थित कारण और प्रभाव का अध्ययन.

    विज्ञान की परिभाषा है (वेबस्टर न्यू कॉलेज डिक्शनरी):
    Science :
    1.(ARCHAIC) the state or fact of knowledge; knowledge
    2.systematized knowledge derived from observation, study, and experimentation carried on in order to determine the nature or principles of what is being studied
    3.any specific branch of scientific knowledge, esp. one concerned with establishing and systematizing facts, principles, and methods, as by experiments and hypotheses: the science of mathematics
    4.the systematized knowledge of nature and the physical world
    any branch of this
    5.skill based upon systematized training: the science of cooking

    यह परिभाषाए कहती हैं "The systematic study of any subject is science."

    इमाम के यह कहने के पीछे क्या सिस्टम था? था भी या नहीं? किस काज और इफेक्ट के अवलोकन पर उन्होंने कहा? उनका अवलोकन गणितीय नहीं तो खगोलीय रहा होगा? खगोलीय साक्ष्य ही सही, वह इस मान्यता तक पहुंचे कैसे? या यूँ ही फिलासफी पेल दी?

    और इसमें भी पेच यह की उन्होंने अलग अलग समय में फैलने सिकुड़ने की बात कही है, हाकिंग की तरह सिकुड़कर विलीन होने और फिर अस्तित्व में आने की नहीं. इसपर भी कोई कारण नहीं दिया. ऐसे कैसे वैज्ञानिक?

    फैलना-सिकुड़ना तथा विलीन होना-और अस्तित्व में आ जाना बहुत जुदा चीजें हैं.

    और फिर बोलने को कोई भी बड़े बड़े सिद्धांत पेल सकता है. साबित करना ही तो मुश्किल है.

    अगर आप उन्हें वैज्ञानिक कहते हैं तो, उन्हें विज्ञान की परिभाषा पर खरा उतरना होगा. एक वैज्ञानिक की बात तभी मानी जाती है जब वह अपना दावा वैज्ञानिक रीति से साबित कर दे. वर्ना काहे का वैज्ञानिक?

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  53. आस्तिकों के साथ यही दिक्कत है, बिना तर्क बिना आधार बातों को मान लेना.

    क्योंकि इतने बड़े इमाम/पैगम्बर/नबी/ हजरत/ संत/ खलीफा ने फलां बात कही तो ज़रूर ईश्वर की प्रेरणा से कही होगी. जिन्न, भूत, अन्जील, हूर, परी सब इसी तर्क पर साबित हो जाते हैं.

    और चूँकि कुरआन अल्लाह की कृति बताई जाती है, तो कुरआन में ही दुनिया का सारा ज्ञान छिपा हुआ है. बाकि किताबों की क्या ज़रूरत?

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  54. @प्रवीण जी

    यह बात सिद्धान्त-विरुद्ध कहलाती है यदि विषय से कोई अलग बात करे क्योंकि बात यहाँ थी हॉकिन्स के इन विचार में कितना बल है यह चल रही थी उसको तर्क की कसौटी पर क्रमवार पॉइंट-टू-पॉइंट रखना था किन्तु उनका उत्तर न देते हुए आपने उलटे ही मेरे से अलग ३ प्रश्न पूंछे हैं --
    १- ईश्वर क्या है, परिभाषित करें ?
    २- ईश्वर क्यों है ?
    ३- ईश्वर किसके लिये है ?

    खैर चलो छोडो हॉकिन्स को मैं आपके इन सभी प्रश्नों का उत्तर अपने ब्लॉग पर देता हूँ. ये प्रश्न आप ही के नहीं बहुत लोगो के मन में होंगे इसीलिए इनको टिप्पणियों में नहीं लेख द्वारा रखता हूँ. थोड़ा सा धैर्य रखें.

    @ zeashan zaidi
    मेरी समझ में एक बात नहीं आती यदि हथेली पर अमरुद रखा है जिसको मैं प्रत्यक्ष देख पा रहा हूँ, अनुभव कर रहा हूँ उसको चख कर भी देख चुका हूँ फिर भी तुम लोग उसको सेव कहने पर क्यों तुले हो.

    कहने का मतलब यह है जो प्रमाण प्रत्यक्ष है उसको कैसे नाकारा जा सकता है. मुस्लिम मजहब के लोग पूरी दुनिया में सबसे अधिंक आतन्क मचाये हुए हैं, विज्ञान-विरुद्ध बाते करते हैं, कुरआन और हदीस में कितनी ही सैकड़ों बाते विज्ञान विरुद्द हैं, कुरान से सिद्ध होता है वो ईश्वरीय वाणी नहीं है, मोहमद का चरित्र कैसा था यह भी सभी को पता है,औरत की क्या दशा है इस्लाम में आज भी दीखता है किन्तु फिर भी जबरदस्ती उसको बेशर्मी से वैज्ञानिक, औरतों का सरंक्षक, शान्ति का मजहब सिद्ध करने पर क्यों तुले हो, क्यों इस नर्क की आग में झुलस रहे हो क्यों कुए के मेंडक बने हुए हो अपने कुए से बहार निकल कर देखो कितना जल है. यदि किसी मुसलमान ने २-४ अच्छी बातें कहीं से टीप-टाप के लिख भी दीं हो तो शेष चरित्रहीनता और विज्ञान विरुद्ध बातों का क्या करें जो तुम्हारे मजहब में भरी पड़ी हैं.

    उत्तर देंहटाएं
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    @ सौरभ आत्रेय जी,

    गलती मेरी है...मैंने सोचा कि आप जब यह कह रहे थे कि...

    "जो बात स्पष्ट नहीं होती उसको समझे या पूंछे जैसे कि मैंने भी आपसे एक बात का स्पष्टीकरण माँगा. आप अपना तर्क रखें फिर मैं अपना रखता हूँ. एक स्वस्थ वाद करते हैं इस विषय पर बिना पूर्वाग्रहग्रस्त हुए"

    उस समय आप स्वयं को पोस्ट के विषय पर ही सीमित न रखते हुऐ 'आध्यात्म' के बारे में कह रहे हैं...मेरा ऐसा सोचना त्रुटिपूर्ण था...क्षमा चाहता हूँ...

    मित्र जीशान जैदी भी यहाँ पर आपकी तरह ही धर्म, आध्यात्म और ईश्वर के पक्ष में खड़े हैं...विभिन्न धर्मों की कमियाँ व श्रेष्ठताओं की चर्चा करने का मेरा उद्देश्य कतई नहीं था...इसलिये आप द्वारा मित्र जीशान जैदी पर यहाँ किया गया कटाक्ष मुझे उचित नहीं लग रहा है...बाकी आप स्वयं विवेकशील हैं...


    ...

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  56. @आत्रेय जी

    अपने हिन्दू धर्म में भी पाखंडी, धोखेबाज़, धर्म के नाम पर खून खराबा करने वाले कम नहीं हैं. क्या हिन्दुओं में मुस्लिमों से कम स्वार्थी, कम अनैतिक या भ्रष्टाचारी हैं? दूसरों पर अंगुली उठाने से पहले ज़रा हम अपने गिरेबान में झाँक लें.

    रामचरितमानस में भी कम मलबा नहीं भरा हुआ है. सभी मजहब शोषण को बढ़ावा देते हैं और तर्क, वैज्ञानिक सोच को ख़ारिज करते हैं. चाहे वह हिन्दू हो या कोई और.

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  57. @प्रवीण जी
    ईश्वर की सिद्दी और ब्रह्माण्ड की बातें चल रही है और अध्यात्म की बात न हो यह कैसे सम्भव है, अध्यात्म ही तो धर्म का मूल और वह विज्ञान है जिसके द्वारा ऐसे गूढ़ तत्वों को समझा जाता है और जिसको पश्चिमी जगत अपनी भाषा में ultra science बोलता है। इसीलिए मैं विषय से अलग नहीं उसी के बारे में कुछ समझाने का प्रयास कर रहा था आप ध्यान से उसे दोबारा पढ़ें।
    जीशान जैदी धर्म, अध्यात्म और ईश्वर के पक्ष में नहीं खड़े हैं इनको मैं अच्छी तरह समझता हूँ ये केवल कुरआन के पक्ष में खड़े हैं जोकि धर्म नहीं साम्प्रदायिकता सिखाती है, अध्यात्म से इनका कोई नाता नहीं होता और ईश्वर की परिभाषा में इनका अल्लाह आता नहीं यह सत्य है नहीं विश्वास हो तो कुरआन पढ़ें जब कहना की ये ईश्वर की सिद्धि की बात कर रहे हैं या कुछ ओर सारे मुस्लिम जेहादी और आतंकवादी अल्लाह की लड़ाई लड़ रहे हैं वो चीख-२ कर बोलते हैं फिर भी आप उनकी इस बात को अनदेखा कर रहे हैं और जीशान भी उन्हीका supporter है। उदाहरण के तौर पर अफजल आदि लोगो को इसलिए फांसी नहीं दी जा रही कि मुस्लिम वोट बैंक नाराज़ हो जायेगा इससे क्या निकल कर आता है ये सभी इन आतन्कवादियों के supporter हैं और भेड़ की खाल में भेडिये हैं इनका सब जगह तिरस्कार होना चाहिये आप इनको support देते हैं तो दीजिए पर मैं नहीं दे सकता क्योंकि मैं इनकी टीम के बारे में नस-२ से वाकिफ हूँ। ये और इनके अन्य साथी ब्लॉग जेहादी के रूप में सक्रिय हैं
    @ab inconvenienti जी
    @”अपने हिन्दू धर्म में भी पाखंडी, धोखेबाज़, धर्म के नाम पर खून खराबा करने वाले कम नहीं हैं। क्या हिन्दुओं में मुस्लिमों से कम स्वार्थी, कम अनैतिक या भ्रष्टाचारी हैं? दूसरों पर अंगुली उठाने से पहले ज़रा हम अपने गिरेबान में झाँक लें।”
    आपने स्वयं कहा है कि धर्म के नाम पर वो ऐसा कर रहे हैं मैं भी मानता हूँ लेकिन ऐसे लोग धर्म का पालन कर रहे हैं ये न मैं कहता हूँ और न कोई और आप जैसा समझदार हिन्दू। सभी कहते हैं कि वो धर्म के नाम पर गलत कर रहे हैं और यह १००% सत्य है क्योंकि हमारे मूल धर्म में ऐसा नहीं लिखा है और न ही किसी मान्य पुरुष ने कहा है। जबकि जीशान जैदी जैसे लोग उन जेहादी आतंकवादियों के कार्यों को अपने मजहब का कार्य मानते हैं, यह सम्भव है कि वो अभी यहाँ मना करे लेकिन इनकी चालों को आप नहीं समझते हैं, ये जाकिर नायिक के चेले हैं।
    हिन्दुओं में अनैतिक, स्वार्थी और भ्रष्टाचारी लोग अनेक मिलेंगे इस बात को किस ने मना किया है लेकिन हमारा धर्म इसको नहीं सिखाता ये सामाजिक बुराइयां हैं जबकि इनका मजहब इनको बहुत सी अनैतिक बातें सिखाता है। धर्म और मजहब में धरती आसमान का अन्तर है इस बात को समझिए। जो सत्य और न्याय है वही धर्म है। मजहब एक सम्प्रदाय की भांति है जो एक अपनी स्वार्थ सिद्धि और साम्राज्य को खड़ा करने के लिये बनता है। हिन्दुओं में भी ऐसे सम्प्रदाय हैं लेकिन हिन्दू मूल धर्म उसके विरुद्ध है वो केवल न्याय और सत्य को मानता है । आरोप लगाने से पहले अपने धर्म से पहले परिचित होइये। हमारे धर्म में बिना तर्क के कोई बात मान्य नहीं है।

    @”रामचरितमानस में भी कम मलबा नहीं भरा हुआ है। सभी मजहब शोषण को बढ़ावा देते हैं और तर्क, वैज्ञानिक सोच को ख़ारिज करते हैं। चाहे वह हिन्दू हो या कोई और”
    सबसे पहले तो रामचरितमानस हमारी प्रमाणिक मान्य धर्म पुस्तक नहीं है । वाल्मीकि रामायण और महाभारत एक ऐतिहासिक और सामाजिक धर्म ग्रन्थ है किन्तु उनमे इतनी मिलावट हो चुकी है कि वो आज की दिनांक में बिलकुल भी मान्य नहीं हैं और वैसे भी वो धर्म की मूल पुस्तकें नहीं हैं। हमारे मूल धर्म की पुस्तकें वेद, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और ब्रह्मसूत्र या वेदान्त दर्शन, १३ उपनिषद, पाणिनि व्याकरण हैं इनके अलावा कुछ और भी मान्य हैं। अब प्रवीण जी बोलेंगे ये तो अध्यात्म की पुस्तकें हैं तो महानुभव यही हमारी धार्मिक पुस्तकें हैं धर्म से अध्यात्म और विज्ञान है। इन पुस्तकों में एक भी अतार्किक और अवैज्ञानिक बात दिखाओ तो मैं मानूं। सभी मजहब शोषण को बढ़ावा देते हैं और तर्क, वैज्ञानिक सोच को ख़ारिज करते हैं बिलकुल सत्य है किन्तु धर्म इनसे अलग तर्क को वैज्ञानिकता को और मानवीयता को बढ़ावा देता है इस बात को समझिए। हिन्दू आज अपने मूल धर्म से भटक कर साम्प्रदायिक हो गया है यह भी उसकी और इस देश की दुर्दशा का कारण है। और तभी आप लोग अपने धर्म को इन मजहबों की पंक्ति में खड़ा कर रहे हैं। सम्पूर्ण न्याय दर्शन तार्किकता और प्रमाण को सर्वोपरि मान्यता देता है जिसका पालन हमारे सभी मान्य धार्मिक ग्रन्थ करते हैं धर्म तर्क और वैज्ञानिकता पर ही होता है किन्तु मजहब या सम्प्रदाय नहीं।

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  59. प्राचीन भारत में एक बहुत ही पुण्यात्मा वाले ब्राह्मण रहते थे ,उनके बारे में कहा जाता था की वो सबसे ज्यादा प्रभावी व् तत्व ज्ञानी हैं |एक दिन उनके वहीँ के राजा उनको अपने सामने प्रकट होने का आदेश भेजा |जब वो ब्राह्मण महल में पहुचे तो ->
    राजा ने कहा ->आप के बारे में बहुत सुना है तो आप को मेरे ३ सवालों का जबाब देना होगा नहीं तो मुझे तुम्हारे सिर को काटने का आदेश देना होगा |
    ये सवाल थे १->ईस्वर कहाँ है ?
    २->मैं उसे क्यों नहीं देख सकता ?
    ३->और पूरे दिन भगवन करते क्या हैं ?
    अब ब्राह्मण भयभीत व् आतंकित हो गए, क्योकि ये प्रसन न सिर्फ पेचीदा थे ,बल्कि उनको समझाना भी इतना आसान न था |दुसरे शब्धो में कहें तो वो ब्राह्मण उत्तर नहीं जानते थे |इसलिए उनकी फांशी की सजा की तिथि तय कर दी गयी |
    अगले दिन उस ब्राह्मण का लड़का जो सिर्फ १८ साल का था , वो राजा के दरबार में पंहुचा और बोला मैं सभी प्रशनों का उत्तर दूंगा ,लेकिन आप को मेरे पिता को छोड़ना होगा |राजा मान गया |तब उस ब्राह्मण के लड़के ने दूध से भरा, एक बड़ा पात्र मंगवाया और उसको मंथन करके मक्खन बनवाया |और राजा से कहा मैंने आप के दो प्रसनो का उत्तर दे दिया है |राजा ने आपत्ति की नहीं तुमने अभी कोई उत्तर नहीं दिया है |तब उस लड़के ने पुछा ,मंथन करने से पहले माखन कहाँ था |
    राजा ने कहा ->दूध में
    लड़के ने पूछा ,दूध के किस भाग में
    राजा ने कहा ,सारे दूध में
    तब लड़के ने कहा ,इसी प्रकार परमात्मा सब में है ,वो सब में विराजमान है |
    राजा ने कहा ,ये पहले प्रसन का उत्तर है ,अब दुसरे का उत्तर बताओ की मैं उसे क्यों नहीं देख सकता ?
    लड़के ने कहा क्योकि आप ने अपने मस्तिष्क को ,मंथन व् प्रत्यक्ष ज्ञान से, ध्यान द्वारा निर्मल नहीं किया है |और अगर आप ऐसा करेगें तब आप परमात्मा को देख सकते हैं ,इसके किये बिना आप परमात्मा को नहीं देख सकते |कृपया अब मेरे पिता को जाने दें |
    राजा ने जोर देकर कहा बिल्कुल नहीं ,अभी तो तुमने तीसरे प्रसन का उत्त्तर नहीं दिया कि वो परमात्मा पूरे दिन करते क्या हैं ?
    लड़के ने कहा इसके लिए हमें अपने स्थान बदलने होंगे ,आप को यहाँ ,जहाँ मैं खड़ा हूँ ,वहां और मैं आप के राजसिंहासन पर
    लड़के ऐसा करने का जब अनुरोध किया तो रजा मान गया ,लड़के ने राजसिंहासन पर बैठ कर कहा राजन यही उत्तर है ,एक क्षण आप यहाँ थे और मैं वहां ,अब विषय बदल गए हैं ,परमात्मा निरंतर रूप से यही करते हैं ,वो हमें में से किसी का उत्थापन करते हैं ,व् किसी का हतोत्साह |
    एक ही क्षण हम गौरवान्वित होते है व् उसी दुसरे क्षण हम कंगाल हो जाते हैं ,ये सब निरंतर रूप से चलता है |हमारा जीवन पूर्णतय उन्हीं के हाथों में है |वो हमारे साथ वहीँ करते हैं ,जो उनकी इच्छा है |यह सुन राजा ने सम्मान के साथ ब्राह्मण व् उसके पुत्र को छोड़ दिया |

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  61. @सौरभ आत्रेय

    आप और जीशान में मुझे कोई अंतर दिखता. न आज के मुख्यधारा हिंदुत्व (जिसे लगभग सभी हिन्दू मानते हैं) और दूसरे मजहबों में कोई अंतर है, सभी संगठित माफिया की तरह काम कर रहे हैं, अंधविश्वास, शोषण, अनैतिकता, लालच, राजनीति, खून और पाखंड पर पल रहे हैं.

    आप जिसे मिलावटी, सांप्रदायिक या नकली हिंदुत्व कह रहे हैं वही आज लगभग सभी हिन्दुओं का धर्म है. ईमानदारी से बातें वेद, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और ब्रह्मसूत्र या वेदान्त दर्शन, १३ उपनिषद कितने हिन्दुओं को पता हैं? हिन्दुओं के लिए धर्म केवल केवल मंदिर, मूर्ति, रामचरितमानस, ज्योतिष, महाभारत, मेरी भीड़-तुम्हारी भीड़ और अंधश्रद्धा रह गया है.

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  62. One may believe or disbelieve but it is a fact that everyone is an integral part of Supreme Spirit and a participant in Its fun and frolic.

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  63. @ab inconvenienti

    वेद में लिखा है की पूरा ब्रह्माण्ड परमात्मा का ही काया (शरीर) है ,ब्रह्माण्ड का जो भी स्वरूप है वही ब्रह्म का रूप या शरीर है । वह अनादि है, अनन्त है । जैसे प्राण का शरीर में निवास है वैसे ही ब्रह्म का अपने शरीर या ब्रह्माण्ड में निवास है । इसलिए हम प्रकृति की पूजा करते हैं |
    जिस रूप में वह आनन्ददाता है, मनोहारी है उसका नाम राम है ।
    राम की को ईश्वर का अवतार माना जाता है |अवतार मानने के पीछे यह है की ऐसा हिन्दुसियम में माना जाता है की सभी जीवों में मनुष्य ही सबसे बुद्धिमान है इसलिए उस परमात्मा की सबसे अच्छी रचना मनुष्य ही है ,ये मानना भी है की उस परमात्मा ने मनुष्य को ही अपना रूप दिया है |इसलिए जब कभी कोई महान व्यक्ति पैदा होता है तो उनको परमात्मा का अवतार माना जाता है |
    परमात्मा का अवतार न की परमात्मा |

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  64. Human itself is part of nature

    somebody can respect RAM Krishna ,somebody not

    they r not bound to worrship to any body it is hindusium

    There is perfect democracy in the Vedas .There is diversity of views because they contain passages of preliminary research as well as fundamentals of highest degree of truth

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  65. @Saurabh Atrey Ji,
    हालांकि मैं इस स्पष्टीकरण को बार बार दोहराना आवश्यक नहीं समझता लेकिन चूंकि आपने मेरे आदरणीय प्रवीण जी के ब्लॉग पर मेरे खिलाफ लिखा है अतः एक बार फिर मैं यहाँ कह रहा हूँ के मैं किसी भी तरह के आतंकवाद के खिलाफ हूँ और मौलाना डा. ताहिर-उल-कादरी जो विश्व प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान व चिन्तक है उनका हामी हूँ. जिनका अभी हाल ही में 600 पन्नों का फतवा आया है की आतंकवादी, सुसाइड बोम्बर और निर्दोषों को मारने वाले जिहादी पूरी तरह इस्लाम से बाहर हैं और उनकी जगह नरक है. ये फतवा आप यहाँ पढ़ सकते हैं या यहाँ देख सकते हैं.
    Ab Inconvenienti Ji से क्षमा के साथ, सोचता था की इसबार उनसे एक अच्छी बहस होगी. लेकिन अब मूड नहीं.

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  66. @ab inconvenienti जी
    @"आप और जीशान में मुझे कोई अंतर दिखता. न आज के मुख्यधारा हिंदुत्व (जिसे लगभग सभी हिन्दू मानते हैं) और दूसरे मजहबों में कोई अंतर है, सभी संगठित माफिया की तरह काम कर रहे हैं, अंधविश्वास, शोषण, अनैतिकता, लालच, राजनीति, खून और पाखंड पर पल रहे हैं."

    मैं उस कथित हिंदुत्व की पैरवी यहाँ नहीं कर रहा हूँ और जैसे मैं पहले ही लिख चुका हूँ. अंधविश्वास, शोषण, अनैतिकता, लालच, राजनीति, खून और पाखंड के मैं भी विरुद्ध हूँ. मैं उस मूल सनातन हिन्दू वैदिक धर्म की बात कर रहा हूँ जिसको आज अधिकतर हिन्दू नहीं जानते जैसा कि आपने भी स्वीकारा ही है और ये कैरानवी और अनवर जमाल के चेले उसको आजकल कुरआन से जोड़ने का जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं हिन्दुओं को धोखे में डालने के लिये.अब लगता भी है वो आंशिक रूप से थोड़ा सफल भी हो रहे हैं. खैर मेरी उपरोक्त अन्तिम टिप्पणी के बावजूद मुझमें जीशान में आपको कोई अन्तर समझ में नहीं आता यह आपकी मनोदशा है इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता और आप जीशान जैदी से अपनी बहस चालू रखें क्योंकि मुझे भी लगता है मैंने यहाँ आप लोगो के रंग में भंग डाला है. आप महान लोग विज्ञान तथा जीशान और अनवर जमाल के चेले ईश्वर और अध्यात्म के महान ज्ञाता है इसीलिए आप अपना यह अभियान चालू रखें, इस अन्तिम टिप्पणी करने के बाद मैं ही यहाँ से जाता हूँ.

    @जीशान जैदी
    भाई अपना मूड मत खराब करिये और अपनी बहस जारी रखिये यह मेरी ही गलती है मैं इस बहस का हिस्सा बना.आप इस पृथ्वी और सृष्टि के हर ज्ञान को १४०० साल के आस-पास घुमाते रहने का अभियान भी चालू रखें. मैं यहाँ से विदा लेता हूँ.

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  67. कोई महामूर्ख ही होगा जो कैरानवी, सलीम और जीशान के खोखले तर्कों को मानेगा. नौसिखिये हैं बेचारे, इन्हें अभी ठीक से तर्क करना सीखना है.

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  68. इन सब बातों से यह साबि‍त करने की कोशि‍श की जा रही है कि‍ चर्चाकार ईश्‍वर के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, या कभी जान सकते हैं।


    पर जि‍न्‍हें ये नहीं पता जुकाम क्‍यों होता है और जो एक गाली सुन कर बौखला जाते हैं... सींग मारने को दौड़ते हैं, उन्‍हें क्‍या ऐसी बातें करना शोभा देता है।

    सभी जानते हैं कि‍ स्‍टीफन हाकिंग हो या आज का वि‍ज्ञान सब अंदाजा ही है। वैज्ञानि‍क सि‍द्धांतों में समय के साथ फेरबदल क्‍यों होते हैं, कल जो वैज्ञानि‍क सत्‍य था, आज कोई दूसरा ही और सत्‍य नि‍कल आता है। "अपवाद" भी वैज्ञानि‍क तथ्‍य है, फि‍र इस बारे में क्‍या कहा जाये।

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  69. respected प्रवीण जी - इस पोस्ट को देख कर मुझे लगता है , कि आपको यह सीरीज पसंद आएगी - जो मैंने सितारों की जीवन यात्रा पर लिखी थी | यह लिंक देखिएगा जब भी समय मिले | आभार |

    http://scienceshilpa.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%87

    sorry - i do not know how to create a link in a comment .

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  70. this is very inspirational post , mostly for youth of india ,
    thanks for such a motivational writing . hope will see some more n my next visit .

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  71. maine stiphen hawkins ke vicharo ko galat sabit kar diya hai.. koi awashya hai jisne big bang ke liye urja utpan ki thi jise ham god kahte hai...kyonki koi bhi karya akaran nahi hota...jyada jaanne ke liye niche diye link ko dekhe isme physics ke niyamo ko lekar hi sabit kiya hai maine ki god to hai....stephin hawkins ke vicharo ko bhi dhyaan me rkkha fir tark kiya aur jo paya wo is link me khud dekhiye..
    http://myblogshivpratap.blogspot.in/p/blog-page_18.html

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