मंगलवार, 29 अगस्त 2017

स्कूल जाती बच्चियाँ।

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सुबह की सैर के दौरान
दिखती है अक्सर ही
स्कूल जाती बच्चियाँ
करीने से दो चोटी बनाये
साफ सुथरी यूनिफॉर्म पहने
हाथों में भी किताबें संभाले
एक दूसरे से चुहल करके
फिर हँसती मुस्कुराती हुई
चिड़ियों सी चहचहाते हुऐ

स्कूल नहीं है दरअसल वो
वह तो है कारखाना एक
जहाँ बनायेगी बच्ची हरेक
अपने लिये औजार अनूठा
ज्ञान-शिक्षा की उस भट्टी  में
अपनी लगन से तपातपा कर

उसी औजार से यही बच्चियाँ
बना लेंगी अपनी खिड़कियाँ
तोड़ देंगी समस्त प्रतिबंध भी
छीन लेंगी यही सब बच्चियाँ
दुनिया के न चाहते हुए भी
अपने हिस्से का पूरा आसमान

अपने आसमान में उड़ते हुए
कल यही स्कूल जाती बच्चियाँ
बना देंगी दुनिया को भी थोड़ा
और ख़ुशनुमा-रंगीन हसीन भी

बेहद सुकून देता है मन को
स्कूल जाती बच्चियाँ देखना
क्योंकि वहीं जाकर बनायेंगी वो
बड़े काम का वो बड़ा औजार !

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